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बिना ड्राइवर वाली कार- क्‍या हो अगर कार को सोचना पड़ें एक्‍सीडेंट के वक्‍त क्‍या करना है ?

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क्या हो अगर बिना ड्राइवर वाली कार को सोच-समझ कर निर्णय लेना पड़े और एक्सिडेन्ट होने में बस दो ही सेकन्ड का फासला हो?

आज हम एक ऐसी दुनिया में हैं जहां मशीनें (या रोबोट कह लें) साथ रहते और काम करते हैं। आपका फोन, कॉफी मशीन, एटीएम मशीन, इलेक्ट्रिक टी वेन्डिन्ग मशीन – सब रोबोट के ही तो उदाहरण हैं। इस साल गूगल का अपने बिना ड्राइवर वाली कार दुनिया को दिखाने के बाद, हम यह कह सकते हैं कि यह रोबोट अब एक कार भी हो सकती है।

आज तक टेक्नोलाजी विधताओं ने अनेक क्षेत्र में अपनी सफलता के झण्डे गाड़े हैं लेकिन इन्टेलिजेन्ट टेक्नोलॉजी के मामले में अभी बहुत कुछ हासिल नहीं हो पाया है। यानि कि ऐसे रोबोट जो स्वयं परिस्थितियों का अनुमान लगा कर, निर्णय लें, और उसका कार्यान्वयन कर सकें- अभी नहीं बन पाए हैं। (इस प्रकार के रोबोटस् जो मनुष्य के कन्ट्रोल से परे हों, यह नैतिक रूप से चर्चा का विषय है। परन्तु आज हम विषय पर कुछ नहीं कहेंगे।)

ऐप में रूचि अनुसार खबरें सजा कर पेश करना, फोन को पलट कर रखने से फोन को वाइब्रेशन मोड पर डाल देना, मित्र का जन्मदिन या सालगिरह याद दिला देना, या फिर नज़र हटा लेने पर विडियो प्ले रोक देना – हमारो गैजेट (रोबोट) कुछेक स्थितियों का अंदाज़ा लगा, अनुरूप काम कर सकते हैं। परन्तु जहां अकस्मात् किसी कारणवश, पूर्व से फीड नहीं की गई स्थिति का मामला आया, हमें स्वयं जानकारी नहीं कि हमारे गैजेट हमरा कितना साथ देंगे।

ऐसे में ज़रा गौर कीजिए आप अपने मित्र के साथ अपनी नई गूगल की बिना ड्राइवर वाली गाड़ी में बैठकर जा रहे हैं और सामने से ट्रक आए। स्थिति कुछ ऐसी कि दाएं या बाएं मोड़कर कार किसी सरत में एक ही को बचा सकती है। अब आपकी कार, जिस पर आपका कोई नियंत्रण नहीं है वह किसे बचाएगी और किसे खतरे में धकेल देगी? आई, रोबोट में ऐसीमोव का सोचना गलत नहीं था। जब जिंदगी रोबोट के हाथ सौंपी जाए तो इसके परिणाम को लेकर मन में सवालों का उठना लाजमी है।

यह उदाहारण किसी के सामने भी आ सकता हैं, ऐसे में जब दुर्घटना का घटना अटल है तक कार की सोच (या ड्राइवर के हाथ में स्‍टेरिंग हो तो ड्राइवर की सोच) सिर्फ एक की ही जान बचा सकती है। इस विषय पर कार डिजाइनरों को गौर करने की जरूरत है।

यह सवाल जहां बेहद संजीदा है वहीं एक नैतिक प्रश्‍न भी है जिसका उत्‍तर सोचा समझा हो पाना मुश्किल है। ऐसे में साफटवेयर प्रोग्राम में इस तरह की स्थितियों का पूर्वानुमान लगाकर उत्‍तर तैयार करना किसी नदी को उल्‍टे बहा सकने जितना कठिन है।

हमारा मानना है कि तकनीक बनाना एक उपलब्धि जरूर है।परंतु उसे सटीक  रूप से हकीकत में संभव कर पाना अनिवार्य है। गूगल का जहां तकनीक का बेहद उम्‍दा उदाहारण है वहीं हमें यह जानने का इंतजार है कि विपदजनक हालात में इस प्रकार की तकनीक काम कैसे करती है।

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