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9 गैजैट जिन्हें आप फिर शायद कभी ना देख पाएं

January 20, 2015 Leave a comment Go to comments
शटर-वाला टीवी

शटर-वाला टीवी

बचपन से हमने ऐसे कई गैजैट देखे और इस्तेमाल किए हैं जो आजकल बाज़ार में दिखाई नहीं देते, पर इनकी याद जैसे हमारे बचपन का अभिन्न हिस्सा थे, (या हैं)। मैं आज कुछ ऐसी ही 10 चीज़ो (गैजैट) को याद करने की कोशिश कर रहीं हूं जो मेरे बचपन (कॉलेज तक) का हिस्सा थे और जिन्हें मैं हमेशा एक मुस्कुराहट के साथ याद करुंगी।

शटर-वाला टीवी

हमारे घर में बीनाटोन का टीवी था जो एक लकड़ी के बने खास बक्से में आया था। इस टीवी में एक शटर था जिसमें एक ताला लगाने की सुविधा थी। बुधवार की रात को चित्रहार का कार्यक्रम देख़ने के लिए टीवी खोला जाता, और रात का समाचार बुलेटिन देख़ने के बाद टीवी का शटर डाल दिया जाता था।

आजकल के फ्लैट पैनल टीवी से कहीं अलग इस टीवी में ख़ास पिक्चर ट्यूब होती थी जिसे केथोड रे ट्यूब कहते हैं।

ऐसे टीवी डिजिटल सिग्नल की बजाय ऐनालॉग सिग्नल को पढ़ पाते थे और इनकी ख़ास बात हुआ करती थी इनमें लगने वाला एन्टिना। घर के ऊपर छत पर एन्टिना लगा कर उसे टीवी स्टेशन की दिशा में मोड़ना टीवी देखने का ही हिस्सा था।

पंचायत भवन में टीवी

1975-76 के दौरान टीवी भारत में नया-नया आया था और सरकारी स्कूलों में, पंचायत भवन में सरकार की मदद से टीवी के सेट् लगाए गए थे जिन पर सैटैलाइट डिश के ज़रिए दूरदर्शन ज्ञानवर्धक कार्यक्रम प्रसारित किया करता था। बाद में इसरो और नासा के साथ शुरु किया गया ये कार्यक्रम तो समाप्त हो गया परन्तु ये टीवी सेट् स्कूलों में ही रह गए।

गरमी की छुट्टियों में गांव के स्कूल के छोटे से मैदान में लगा सैटेलाइट का डिश एन्टिना मेरे कौतूहल का विषय काफ़ी साल तक बना रहा। कई बार शाम को दोस्तों के साथ और पूरे गांव के लोगों के साथ मैं कृषि दर्शन के भी दर्शन कर आई थी। पर हालिया वर्षों में पूरे गांव का साथ में बैठ कर टीवी देखना नज़र आया न कोई कृषि दर्शन देखता ही नज़र आया।

टू-इन-वन

टू-इन-वन

रेडियो और टू-इन-वन 

हमारे बच्चों को अमीन सयानी की आवाज़ और पिताजी का रविवार की सुबह विविध भारती का या रोज़ रात को बिनाका गीतमाला का इंतज़ार करना समझ नहीं आएगा। परन्तु हमें याद रहेगा बैटरी डाल कर रात के आठ बजे पिताजी और उनके दोस्तों का रेडियो पकड़ कर बैठ जाना। गांव के सफ़र पर निकलते वक्त और कुछ साथ हो नो हो एक ख़ास लेदर के बने कवर में रेडियो और पांच-छः बैटरी साथ रखना हम कभी नहीं भूले।

रेडियो के बाद इसकी जगह ले ली टू-इन-वन ने। मुझे याद है हमारे पास फिलिप्स का टू-इन-वन हुआ करता था- जिसमें इच्छानुसार रेडियो या फिर ऑडियो टेप लगाकर टेप रिकार्डर पर गाना सुन सकते थे। तकरीबन एक-दो किलो का यह पुराना गैजैट आज नहीं है फिर भी- गीत, आरज़ू, गाईड, पारसमणि आदि फिल्मों और टी-सीरीज़ के अनमोल रत्न के कैसेट (गीत) कभी भूलने नहीं देता।

वॉकमैन 

मैं सोनी के वॉकमैन फ़ोन की बात नहीं कर रही जिसे सोनी हाल ही में लाँच किया है, मैं बात कर रही हूं उस पोर्टेबल म्यूज़िक प्लेयर की जिसे हम पेन्सिल बैटरी डाल कर सफ़र में साथ लिए रहते थे कॉलेज के दिनों में।

इस गैजेट के पतन का कारण बना पहले एप्पल का एमपी3 प्लेयर और फिर बाद में, आज का सबसे ज़रुरी गैजेट, हमारा स्मार्टफोन।

विसीपी और विसीआर

विडियो कैसैट प्लेयर, शायद अभी भी काफी लोगों को याद होगा। सीडी प्लेयर के आने से पहले तक फिल्में देखने का जाना-माना तरीका था विडियो कैसेट प्लेयर।

गांव-देहात और छोटे शहरों में विडियो कैसैट प्लेयर की दुकान एक अच्छा काम हुआ करता था (जो 1980 के बाद सीडी किराये की दुकानों में तब्दील हो गए) जहां से किराये पर विडियो कैसैट प्लेयर और कैसैट किराये पर मिला करते थे। किसी-किसी दुकानों में टीवी तक किराये पर लिए जा सकते थे।

फ़ोन

फ़ोन

फोन-परिवार-गांव और फ़ोन

काले दिखने वाले भारी-भरकम तार वाले फोन पहले-पहल गांव के पोस्ट ऑफ़िसों में उपलब्ध हुए और बाद में कुछेक घरों तक पहुंचे। ऐसे में फोन किसी एक का ना हो कर पूरे गांव का, रिश्तेदारों का और पड़ोसियों का फोन बन गया था।

कॉलेज के दिनों में मेरे पैतृक गांव में एक ही टेलीफ़ोन था, जो गांव के बीच एक कपड़े की दुकान पर था। गांव में मां या किसी रिश्तेदार से बात करने के लिए फ़ोन कर यह बताना पड़ता था कि अमुक के घर से अमुक के लिए फ़ोन है, खबर पहुंचा दें, हम आधे घंटे बाद फिर से फ़ोन करेंगे।

बात के दौरान ही तय कर लिया जाता था कि अगला फ़ोन अगले रविवार शाम के 7 बजे आएगा।

धीरे-धीरे पहले घरों में इस तारवाले फ़ोन ने प्रवेश किया, फिर बाद में 1990 के दौरान यह तार-विहीन (वायरलेस) हो गया। आज फ़ोन का जगह घरों की बजाय हमारे पॉकेट हैं जहां हर किसी के पास अपना ख़ुद का एक टुनटुनिया है।

8-इंच, 5-इंच और 3.5-इंच के फ्लौपी डिस्क

8-इंच के फ्लौपी डिस्क के बारे में कुछ नहीं कहूंगी क्योंकि मैंने इन फ्लौपी डिस्क को सिर्फ देखा है, इस्तेमाल कभी नहीं किया। परन्तु 5-इंच और 3.5-इंच के फ्लौपी डिस्क मैने कुछ वर्षों तक इस्तेमाल किए हैं।

कॉलेज में पढ़ाई के वक्त 5-इंच फ्लौपी डिस्क में फाइल रखे जाते थे। कुछ फ्लौपी डिस्क को बूट डिस्क बनाया जाता था जिससे कम्पयूटर को चालू किया जा सके। कॉलेज छोड़ते-छोड़ते इन 5-इंच डिस्क का स्थान ले लिया 3.5-इंच के फ्लौपी डिस्क ने। तुलना की जाए तो ये 3.5-इंच वाले प्राणी मज़बूत जान थे और अधिक डाटा (यानि) फाइलें रख पाते थे। बैग में इनके मुड़ने-तुड़ने की आशंका भी कम ही थी

एमएस डॉस

अब जब फ्लौपी डिस्क को बूट डिस्क बनाने की बात हो ही रही है तो एमएस डॉस का ज़िक्र भी कर ही दूं। एमएस डॉस था माइक्रोसोफ्ट का डिस्क ऑपरेटिंग सिस्टम जिस पर कंप्यूटर पूरी तरह से निर्भर हुआ करते थे।

विंडोज़ तो काफ़ी देर में बाज़ार में आया जिसे कंपनियां कंप्यूटर में बेचने से पहले लोड कर देती थीं। पर उससे पहले 1980 में एमएस डॉस था, जिसे कम्पयूटर के साथ बेचा जाता था। कंप्यूटर ऑन कर के सबसे पहले यह डिस्क (जिस डिसिक में एमएस डॉस होता था उसे बूट डिस्क कहते थे।) डिस्क ड्राइव में डालना होता था।

कम्पयूटर बूट होने के बाद कमांड प्राँम्पट पर खुलता था जहां पहले से रटे गए कमांड के ज़रिए आप अपना काम करते थे। जैसे फाइल की डाइरेक्टरी बनाने के लिए mkdir इत्यादि।

पेजर

हम में से काफी लोग होंगे जिन्होंने पेजर का इस्तेमाल किया होगा। भारत में मोटोरोला को आज भी याद करने की वजह यह छोटे पेजर ही तो थे, जिन्हें कई लोग कमर की बेल्ट के साथ बांध कर रखना पसंद करते थे। पेजर के ज़रिए छोटे संदेशों का आदान-प्रदान होता था।

साल 2002 में मोटोरोला ने पेजर बनाने बंद कर दिए, उसके बाद साल 2004 में भारत में पेजर का व्यवहार भी बंद ही हो गया।

चित्र आभार: ajithprasad.comen.wikipedia.orgwww.turbosquid.com

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